व्यक्तिगत आपदा प्रबंधन

ईश्वर न करे किसी के साथ भी कोई दुर्घटना हो। लेकिन असुरक्षा जीवन का दूसरा नाम है। जीवन जरा भी सुरक्षित नहीं है। जीवन जोखिम भरा होता है। जब सब ठीक चलता है तो हम बेफिक्र रहते हैं। कोई दुर्घटना, भूकम्प या अन्य प्राकृतिक आपदा की खबर सुनते हैं तो भी यह मान लेते हैं कि अपने साथ तो यह नहीं हो सकता। सरकार का अलग एक विभाग है ‘आपदा प्रबंधन’ का। जब भी कोई प्राकृतिक आपदा या बड़ी दुर्घटना होती है तब आपदा प्रबन्धन से जुड़े लोग और मिलेट्री को बुलाया जाता है। परन्तु क्या हम स्वयं आपदा से निपटने को तैयार हैं या आपदा आने पर किसी की मदद कर सकते हैं? हम बात कर रहें है ‘व्यक्तिगत आपदा प्रबंधन’ की।

पिछले दिनों चेन्नई में भीषण बाढ़ का प्रकोप था। इस बाढ़ से मेरे एक घनिष्ठ मित्र सुरेश कर्वे भी प्रभावित हुए। सुरेश कर्वे भारतीय तट रक्षक के कमांडेंट पद से स्वेच्छा से सेवा निवृत होकर वर्तमान में एल. एंड टी. कम्पनी में उच्च पद पर कार्य कर रहे हैं। इस कठिन समय में उन्होंने जो महसूस किया और शेयर किया वो हम सभी के लिए अत्यंत उपयोगी है।

श्री सुरेश कर्वे द्वारा उपरोक्त दिए गए सुझाव महत्वपूर्ण हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह महसूस किया गया है कि सबसे ज्यादा असुरक्षा जो समाज में बढ़ी है वो है रिश्तों की असुरक्षा। रिश्तों की डोर पतली होती चली जा रही है। यह दौर है आपसी विश्वास के अतिक्रमण का। पिता अपने बच्चों से, पत्नी पति से या पति पत्नी से वो सब कुछ शेयर नहीं कर रहें हैं जो उन्हें करना ही चाहिए। आज व्यक्तिगत जीवन इतना साफ़ सुथरा नहीं रह गया है कि वो खुली किताब की तरह हो। क्या पिता अपने बच्चों को पूरी ईमानदार से अपनी कमाई बता सकते हैं? क्या ये भी बता सकते हैं कि कितनी कमाई बेईमानी की है? बच्चे क्या इमानदारी से अपने मित्रों के बारे में या कहाँ आ-जा रहें हैं बता सकते हैं? क्या पति अपनी पत्नी को अपनी पूरी आमदनी बता देते है? क्या आप अपना या बच्चे का मोबाइल एक दुसरे को दे सकते हैं? क्या हम अपने पडोसी या घनिष्ठ मित्रों पर भरोसा कर सकते हैं?

ये तमाम प्रश्न हैं, जिनका उत्तर अगर हाँ है तो व्यक्तिगत आपदा प्रबंधन आपको और आपके परिवार को बहुत सी मुसीबतों से बचा सकता है।   

– प्रवीण गार्गव

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